Sunday, 12 May 2013

द्वितीयाध्याये प्रथमः पादः 2-1

पाणिनि महर्षि विरचिता अष्टाध्यायी 
द्वितीयाध्याये प्रथमः पादः


समर्थः पदविधिः  ॥ २,१.१ ॥
सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे  ॥ २,१.२ ॥
प्राक्कडारात्समासः  ॥ २,१.३ ॥
सह सुपा  ॥ २,१.४ ॥
अव्ययीभवः  ॥ २,१.५ ॥
अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययासम्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्तव्चनेषु  ॥ २,१.६ ॥
यथाऽसादृश्ये  ॥ २,१.७ ॥
यावदवधारणे  ॥ २,१.८ ॥
सुप्प्रैत्ना मात्रार्थे  ॥ २,१.९ ॥
अक्षशलाकासङ्ख्याः परिणा  ॥ २,१.१० ॥
विभाषा  ॥ २,१.११ ॥
अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या  ॥ २,१.१२ ॥
आङ्मर्यादाभिविध्योः  ॥ २,१.१३ ॥
लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये  ॥ २,१.१४ ॥
अनुर्यत्समया  ॥ २,१.१५ ॥
यस्य च आयामः  ॥ २,१.१६ ॥
तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च  ॥ २,१.१७ ॥
पारे मध्ये षष्ठ्या वा  ॥ २,१.१८ ॥
सङ्ख्या वंश्येन  ॥ २,१.१९ ॥
नदीभिश्च  ॥ २,१.२० ॥
अन्यपदर्थे च सञ्ज्ञायाम्  ॥ २,१.२१ ॥
तत्पुरुषः  ॥ २,१.२२ ॥
द्विगुश्च  ॥ २,१.२३ ॥
द्विदीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापनैः  ॥ २,१.२४ ॥
स्वयं क्तेन  ॥ २,१.२५ ॥
खट्वा क्षेपे  ॥ २,१.२६ ॥
सामि  ॥ २,१.२७ ॥
कालाः  ॥ २,१.२८ ॥
अत्यन्तसंयोगे च  ॥ २,१.२९ ॥
तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन  ॥ २,१.३० ॥
पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः  ॥ २,१.३१ ॥
कर्तृकर्णे दृता बहुलम्  ॥ २,१.३२ ॥
कृत्यैरधिकार्थवचने  ॥ २,१.३३ ॥
अन्नेन व्यञ्जनम्  ॥ २,१.३४ ॥
भक्ष्येण मिश्रीकरनम्  ॥ २,१.३५ ॥
चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः  ॥ २,१.३६ ॥
पञ्चमी भयेन  ॥ २,१.३७ ॥
अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः  ॥ २,१.३८ ॥
स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन  ॥ २,१.३९ ॥
सप्तमी शौण्डैः  ॥ २,१.४० ॥
सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च  ॥ २,१.४१ ॥
ध्वाङ्क्षेन क्षेपे  ॥ २,१.४२ ॥
क्र्त्यैरृणे  ॥ २,१.४३ ॥
सञ्ज्ञायाम्  ॥ २,१.४४ ॥
क्तेनाहोरात्रावयवाः  ॥ २,१.४५ ॥
तत्र  ॥ २,१.४६ ॥
क्षेपे  ॥ २,१.४७ ॥
पात्रेसमितादयश्च  ॥ २,१.४८ ॥
पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणानवकेवलाः समानाधिकरणेन  ॥ २,१.४९ ॥
दिक्सङ्ख्ये सञ्ज्ञायाम्  ॥ २,१.५० ॥
तद्धितर्थोत्तरपदसमाहारे च  ॥ २,१.५१ ॥
सङ्ख्यापूर्वो द्विगुः  ॥ २,१.५२ ॥
कुत्सितानि कुत्सनैः  ॥ २,१.५३ ॥
पापाणके कुत्सितैः  ॥ २,१.५४ ॥
उपमानानि सामान्यवचनैः  ॥ २,१.५५ ॥
उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे  ॥ २,१.५६ ॥
विशेसनं विशेष्येण बहुलम्  ॥ २,१.५७ ॥
पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च  ॥ २,१.५८ ॥
श्रेण्यादयः कृतादिभिः  ॥ २,१.५९ ॥
क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ् ॥ २,१.६० ॥
सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्यमानैः  ॥ २,१.६१ ॥
वृन्दरकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम्  ॥ २,१.६२ ॥
कतरकतमौ जातिपरिप्रश्ने  ॥ २,१.६३ ॥
किं क्षेपे  ॥ २,१.६४ ॥
पोटायुवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहद्बष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रियाध्यापकधूर्तैर्जातिः  ॥ २,१.६५ ॥
प्रशंसावचनैश्च  ॥ २,१.६६ ॥
युवा खलतिपालितवलिनजरतीभिः  ॥ २,१.६७ ॥
कृत्यतुल्याख्या अजात्या  ॥ २,१.६८ ॥
वर्णो वर्णेन  ॥ २,१.६९ ॥
कुमारः श्रमणादिभिः  ॥ २,१.७० ॥
चतुष्पादो गर्भिण्या  ॥ २,१.७१ ॥
मयूरव्यंसकादयश्च  ॥ २,१.७२ ॥

इति पाणिनि महर्षि विरचिष्टाध्यायी मध्ये
द्वितीयाध्याये प्रथमः पादः

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