Monday, 13 May 2013

द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः 2-2

पाणिनि महर्षि विरचिता अष्टाध्यायी 
द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः
पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे  ॥ २,२.१ ॥
अर्धं नपुंसकम्  ॥ २,२.२ ॥
द्वितियतृतीयचतुर्थतुर्याण्यन्य्तरस्याम्  ॥ २,२.३ ॥
प्राप्तापन्ने च द्वितीयया  ॥ २,२.४ ॥
कालाः परिमाणिना  ॥ २,२.५ ॥
नञ् ॥ २,२.६ ॥
ईषदकृता  ॥ २,२.७ ॥
षष्ठी  ॥ २,२.८ ॥
याजकादिभिश्च  ॥ २,२.९ ॥
न निर्धारणे  ॥ २,२.१० ॥
पूरणगुणसुहितार्थसदव्ययतव्यसमानाधिकरनेन  ॥ २,२.११ ॥
क्तेन च पूजायाम्  ॥ २,२.१२ ॥
अधिकरणवाचिना च  ॥ २,२.१३ ॥
कर्मणि च  ॥ २,२.१४ ॥
तृजकाभ्यां कर्तरि  ॥ २,२.१५ ॥
कर्तरि च  ॥ २,२.१६ ॥
नित्यं क्रीडाजीविकयोः  ॥ २,२.१७ ॥
कुगतिप्रादयः  ॥ २,२.१८ ॥
उपपदमतिङ् ॥ २,२.१९ ॥
अमैवाव्ययेन  ॥ २,२.२० ॥
तृतीयाप्रभृतीन्यतरस्यम्  ॥ २,२.२१ ॥
क्त्वा च  ॥ २,२.२२ ॥
शेषो बहुव्रीहिः  ॥ २,२.२३ ॥
अनेकमन्यपदार्थे  ॥ २,२.२४ ॥
सङ्ख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिकसङ्ख्याः सङ्ख्येये  ॥ २,२.२५ ॥
दिङ्नामान्यन्तराले  ॥ २,२.२६ ॥
तत्र तेन+इदमिति सरूपे  ॥ २,२.२७ ॥
तेन सह+इति तुल्ययोगे  ॥ २,२.२८ ॥
चार्थे द्वन्द्वः  ॥ २,२.२९ ॥
उपसर्जनं पूर्वम्  ॥ २,२.३० ॥
राजदन्तादिषु परम्  ॥ २,२.३१ ॥
द्वन्द्वे घि  ॥ २,२.३२ ॥
अजाद्यदन्तम्  ॥ २,२.३३ ॥
अल्पाच्तरम्  ॥ २,२.३४ ॥
सप्तमीविशेषने बहुव्रीहौ  ॥ २,२.३५ ॥
निष्ठा  ॥ २,२.३६ ॥
वा+आहिताग्न्यादिषु  ॥ २,२.३७ ॥
कडाराः कर्मधारये  ॥ २,२.३८ ॥
 
इति
पाणिनि महर्षि विरचिताष्टाध्यायी 
द्वितीयाध्याये द्वितीयः पादः

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